
किसान परिवार का बेटा 12,000 किमी चलकर जलवायु को इंसानी कहानी बना रहा है.
The Climate Walker कोई यात्रा व्यक्तित्व नहीं है. यह जयदीप लखांकिया की सड़क पर चलती प्रतिबद्धता है: लोगों से मिलना, कचरा उठाना, जलवायु को गांवों, शहरों और स्कूलों की बातचीत बनाना.
चलना अचानक शुरू नहीं हुआ
इस मिशन के पीछे खेती की जड़ें, आउटडोर अनुशासन, कम पैसों की यात्रा, माल्टा में जलवायु अध्ययन और गांधी की पैदल परंपरा से जुड़ी साफ सोच है.
भावनगर और खेती की जड़ें
जयदीप गुजरात के भावनगर से हैं. किसान परिवार में बड़ा होना जलवायु को किताब का विषय नहीं रहने देता; बारिश, गर्मी, पानी, मिट्टी और फसल घर की भाषा बन जाते हैं.
हिसाब-किताब की पढ़ाई से रास्ते तक
उन्होंने पहले पारंपरिक पढ़ाई और करियर रास्ता देखा, फिर यात्रा, पर्यटन और आउटडोर सीखने की तरफ मुड़े. इसी बदलाव ने उन्हें लोगों से सीखने वाली यात्रा की तरफ खींचा.
भारत में 182 दिन की यात्रा
भारत में 182 दिन की अकेली पैदल और लिफ्ट लेकर की गई यात्रा ने उन्हें गांवों की सच्चाई, कम पैसों की यात्रा, लोगों की मदद और जमीन से जुड़ी जलवायु असुरक्षा दिखाई.
माल्टा से वैश्विक मिशन
माल्टा में सतत पर्यटन और जलवायु परिवर्तन को गहराई से पढ़ते हुए मिशन साफ हुआ: बात ऑनलाइन पोस्ट से आगे जानी चाहिए. इसलिए The Climate Walker शुरू हुआ.
वे इसलिए चलते हैं क्योंकि पैदल चलना लोगों को रोकता है
तेज यात्रा दूरी तय करती है. पैदल चलना बातचीत बनाता है. लोग सवाल पूछते हैं, रास्ता बताते हैं, खाना देते हैं, स्कूल बुलाते हैं, स्थानीय मीडिया से जोड़ते हैं और जलवायु को अपने शहर से जोड़ते हैं.
जयदीप प्रसिद्धि, पर्यटन या आराम के लिए नहीं चल रहे. वे इसलिए चल रहे हैं क्योंकि जलवायु परिवर्तन गरीब लोगों, किसानों, मजदूरों और आने वाली पीढ़ियों की जिंदगी पहले से बदल रहा है.
रोज का कचरे वाला बैग इस मिशन को सिर्फ प्रतीक नहीं रहने देता. हर बैग कहता है कि जागरूकता तभी मजबूत है जब उसके साथ व्यवहार भी बदले.
भारत के बाद
भारत पहुंचना अंत नहीं है.
जयदीप इस पैदल यात्रा को सफाई, पर्यावरण शिक्षा, बोलने के कार्यक्रम, डॉक्यूमेंट्री और लंबे समय के पर्यावरण काम में बदलना चाहते हैं, खासकर भारत में.
